Saturday, October 16, 2010

नए तर्क-3

अगर ईश्वर ने ही सबको बनाया है ; हमें ,जानवरों को , घास-फूस , सब कुछ ; तो ये गरीबी ,बीमारियाँ ,मौत ...... भी उसी के कारण है . हम पैदा होते हैं ,बड़े होते हैं ,रोते हैं ,हँसते हैं ,चिल्लाते हैं ,नाचते हैं , इन सब में भी अगर God's will कहीं शामिल है तो जरूर कुछ गंभीर सवाल उठते हैं .

अगर भगवान ही ये सब चाहता है तो फिर इस सारी तिकड़म का मतलब क्या है ,हमारा अस्तित्व क्यों हैं ,हम क्या कर रहे हैं , कहाँ जाना चाहते हैं ? एक जवाब ये उठता है कि हमें विकल्प चुनने की आज़ादी है ;हम मजबूर नहीं हैं , हमारी खुद की will भी है जिसका अपना महत्व है .मैं कहना चाहता हूँ कि अगर हमारी ये will खुद ईश्वर की चाह का नतीजा हो , हमारे सामने के विकल्प और उनका चुना जाना सब पहले से ही नियंत्रित और तय हो ,और ये पूरी प्रक्रिया खुद ईश्वर ने सोच रखी हो तो फिर हमारा क्या महत्व बचता है ,हम केवल नियंत्रित किये जा रही सोच का परिणाम हैं और मुझे आभास हो रहा है कि हम केवल कठपुतली ही हैं .हम सब .... की जा रही चीजों के मज़े लेते हैं ,खुश होते हैं .हमें भरम इतना है कि ये गुलाम सोच हमें अपनी लगती है; पर ऐसा है नहीं ,अगर ईश्वर ही सब कुछ तय करता है तो .

अगर कोई कहता है कि हम मज़े ले तो रहे हैं ,हम अच्छा महसूस कर तो रहे हैं , हम इतना सब कुछ experience कर तो रहे हैं ,फिर क्या problem है .नहीं है ,problem बिलकुल नहीं है ,अगर सब कुछ ऐसा ही है तो ........पर सच ये है कि सब कुछ ऐसा नहीं है .आप गरीबों को देखिये ,जो घिनौनें हैं उन्हें देखिये ,जो गंदे हैं उन्हें देखिये ,जो मौत झेल रहे हैं उन्हें देखिये ,वो तो ऐसा नहीं सोचते , उन्हें God's will की या ऐसी किसी चीज़ की चिंता नहीं है ,वो भी आराम चाहते हैं . तो उनका क्या ? ये क्या उनके पुराने बुरे कामों का नतीजा है जो उन्हें भोगना पड़ रहा है ... अब आप मुझे बताइए कि ये बुरे काम किसकी will से हुए हैं, किसने हमें नियंत्रित किया हुआ है .... God ने.तो फिर वो क्यों कुछ लोगों को अपनी मनमर्जी से अच्छे काम सौंपता है और क्यों कुछ को घिसटना पड़ता है ,क्यों कुछ लोग पैदा होते ही "अच्छे" होते हैं और क्यों कुछ लोग सारी उमर छोटी- छोटी बातें भी नहीं समझ पाते हैं ?
अगर पुनर्जन्म को माना जाये (अगर आप ईश्वर को मान सकते हैं तो पुनर्जन्म भी मान सकते हैं ) तो भी सोचिये back trace करने पर कभी न कभी तो पहली बार ये सब हुआ होगा और तब भी God's will विल के कारण ही हुआ होगा ......तो फिर वही बात सामने आती है कि क्यों कुछ अच्छे हैं और क्यों कुछ गंदे हैं ?

सभी को अच्छा क्यों नहीं ,ये अंतर क्यों ; मैं जानता हूँ कि ये अंतर ही दुनिया को चला रहा है ,अगर कुछ बुरे नहीं होंगे तो कुछ अच्छे नहीं होंगे ,सब एक जैसे हो जायेंगे तो फिर क्या बचेगा . कुछ नहीं बचेगा . तो ठीक है ना न बचे .क्यों इस दुनिया के अस्तित्व की कीमत कुछ लोग भोगें, क्या जरूरत है ?
एक सोच ये हो सकती है कि जो आज बेचारे हैं ,कल वो खुश हों (अगर आप पुनर्जन्म मानते हैं तो ) और इस तरह अंत तक सभी के पक्ष में बराबर-बराबर कष्ट ,सुख आ जायें ; और इस दुनिया का अस्तित्व ठीक इसलिए हो कि हम सब कुछ खुद महसूस कर सकें, हमें खुद चीज़ों का अनुभव हो ,हम भी इस सबका एक हिस्सा बन सकें . ये सोच संतुष्टि देती है और आशा है कि ये ही सच हो.

Monday, April 5, 2010

नए तर्क - 2

बहुत सारे लोगों को देखता हूँ तो महसूस करता हूँ कि हर कोई एक दूसरे से अलग है ; कुछ अपनी चीज़ों में काफी आगे हैं , कुछ ठीक ठाक कर लेते हैं ,कुछ बस कर लेते हैं . इतनी सारी बातों में मैं खुद अपने बारे में कोई खास राय नहीं बना पाया हूँ . खैर , मैं देखता हूँ कि लोग इतने अलग -अलग बनते चले जाते हैं .कोई भी अपनी समझ से बुरे या ख़राब फैसले नहीं लेता है ,सभी वही करते हैं जो उन्हें सही लगता है . परिस्थितियां ,विकल्प और उनका चुनाव ; ये ही साझे तौर पर हमारे निर्माण के उत्तरदायी होते हैं .परिस्थितियों को अगर छोड़ दिया जाए तो विकल्पों की उपलब्धता कुछ हद तक, पर उनका चुनाव तो पूरी तरह से हमारे निर्णयों पर निर्भर करता है . मेरा कहना है कि आप ऐसे दो प्रसंग लीजिये जहाँ पर विकल्प और परिस्थितियां, समान हों और उनका चुनाव पूरी तरह चुनने वाले की सोच पर टिका हो (ये ऐसा कोई बहुत मुश्किल संयोग नहीं है , आप किन्हीं भी स्कूली बच्चों को ले सकते हैं ) तो ...........भी वो अलग -अलग विकल्प चुन सकते हैं .

उनका एक दूसरे से कुछ और चुनना ही उनके स्वतंत्र अस्तित्व या उनकी individuality का समर्थक है और मेरी बातों का आधार भी .सभी एक ही विकल्प नहीं चुनते हैं , वो वही करते हैं जो उनकी समझ को संतुष्ट करता है .ये समझ , पुरानी परिस्थितियों या घटनाओं का ही संग्रहित अनुभव होती है . इस तरह पुरानी परिस्थितियां अपना अस्तित्व खोकर भी नयी परिस्थितियों को नियंत्रित करती हैं .


महत्वपूर्ण ये नहीं है कि हम पिछली परिस्थितियों से अभी भी प्रभावित हो रहे हैं या नहीं , ऐसा होना सामान्य है और सबके साथ होता है ; बल्कि जरूरी ये है कि अगर हम अपनी समझ पर इतना मनचाहा नियंत्रण रख पाएं कि हम उन पुराने अनुभवों से भी परे जाकर सोच सकें , निर्णय ले सकें और विकल्पों को चुन सकें तो हम तटस्थ होना सीख सकते हैं ( दूसरे पहलू से ये एक तरह से अपने भीतर कहीं समय को नियंत्रित करने जैसा है ) . घटनाओं का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष उन्हें तटस्थ नजरिये से देख पाना ही है . हम ऐसा नजरिया विकसित कर सकते हैं जो वास्तव में किसी भी पूर्वाग्रह से ग्रस्त न हो और चीजों को सामान्य परंपरा से हटकर देख सके .

Saturday, March 27, 2010

नए तर्क

बचपन में मैं सोचा करता था कि सारे लोग एक जैसे क्यों नहीं होते जबकि हमारे आदर्श नियम एक जैसे हैं और हर आदमी को उन्हें निभाना चाहिए .अगर ऐसा हो सके तो फिर काफी समस्याएं ऐसे ही सुलझा ली जानी चाहिए, मगर शायद वो चीजों को देखने का सबसे आसान तरीका था . अब मैं सोचता हूँ कि जो बातें किताबों पर कुछ और दिखती हैं उनकी संरचना का वास्तविक अनुमान काफी धुंधला और कठिन होता है, क्योंकि आप किताबी बातों को कोरा का कोरा प्रत्यक्षतः खड़ा नहीं कर सकते. जब वे सामने आती हैं तो उनमें पता नहीं क्या-क्या मिला होता है और जब तक आप उन बातों का अध्ययन करते हैं तब तक कोई न कोई अवयवी बात खुद में अलग हो जाती है . ये सब कुछ ऐसा है कि आप किसी न जानी हुयी चीज के बारे में सोच रहे हैं कि ये इस तरह बदलेगी पर आप उस चीज को अभी तक जान नहीं पाए हैं. कम से कम नियमों के बारे में ये बात लागू होती ही है. आप लोगों से ध्यान से बातें करिए और आप पाएंगे कि काफी लोग नियमों को अपनी सहूलियत के हिसाब से मोड़ देते हैं या उनकी बात तभी करते हैं जब वो उन्हें आराम से निभा सकते हैं .


क्या सभी को कठोरता से उनका पालन करना चाहिए ? ऐसा मैं नहीं कहना चाहता , बल्कि मैं लोगों का ध्यान ठीक इस ओर खींचना चाहता हूँ कि सोचिये अगर सारे लोग एक जैसी सोच रखें, एक जैसी बातें करें, एक जैसा पहनें या देखना चाहें या एक जैसी पसंद रखें तो सब कुछ कितना मशीनी लगेगा और कितना एक जैसा हो जायेगा जैसा कि आदर्श और कठोर नियम हमसे चाहते हैं. हमारे अपनी -अपनी तरह से चीजों को देखने का ढंग ही हमारे अस्तित्व की पुष्टि करता है. यही इस दुनिया के लगातार कुछ नए में सुधरते रहने का आधार है और यही हमारी विविधता को भी सहारा देता है .
नियमों का होना अराजकता को रोकता है मगर उनका पालन सभी करें ऐसा कभी भी संभव नहीं हो सकता है क्योंकि दुनिया हमेशा से ही तमाम संभावनाओं और विकल्पों से भरी हुयी है और रहेगी. "नियमों से संभावनाओं और संभावनाओं से नए नियम " ये चक्र ही हमें नियंत्रित करता आ रहा है .