बहुत सारे लोगों को देखता हूँ तो महसूस करता हूँ कि हर कोई एक दूसरे से अलग है ; कुछ अपनी चीज़ों में काफी आगे हैं , कुछ ठीक ठाक कर लेते हैं ,कुछ बस कर लेते हैं . इतनी सारी बातों में मैं खुद अपने बारे में कोई खास राय नहीं बना पाया हूँ . खैर , मैं देखता हूँ कि लोग इतने अलग -अलग बनते चले जाते हैं .कोई भी अपनी समझ से बुरे या ख़राब फैसले नहीं लेता है ,सभी वही करते हैं जो उन्हें सही लगता है . परिस्थितियां ,विकल्प और उनका चुनाव ; ये ही साझे तौर पर हमारे निर्माण के उत्तरदायी होते हैं .परिस्थितियों को अगर छोड़ दिया जाए तो विकल्पों की उपलब्धता कुछ हद तक, पर उनका चुनाव तो पूरी तरह से हमारे निर्णयों पर निर्भर करता है . मेरा कहना है कि आप ऐसे दो प्रसंग लीजिये जहाँ पर विकल्प और परिस्थितियां, समान हों और उनका चुनाव पूरी तरह चुनने वाले की सोच पर टिका हो (ये ऐसा कोई बहुत मुश्किल संयोग नहीं है , आप किन्हीं भी स्कूली बच्चों को ले सकते हैं ) तो ...........भी वो अलग -अलग विकल्प चुन सकते हैं .
उनका एक दूसरे से कुछ और चुनना ही उनके स्वतंत्र अस्तित्व या उनकी individuality का समर्थक है और मेरी बातों का आधार भी .सभी एक ही विकल्प नहीं चुनते हैं , वो वही करते हैं जो उनकी समझ को संतुष्ट करता है .ये समझ , पुरानी परिस्थितियों या घटनाओं का ही संग्रहित अनुभव होती है . इस तरह पुरानी परिस्थितियां अपना अस्तित्व खोकर भी नयी परिस्थितियों को नियंत्रित करती हैं .
महत्वपूर्ण ये नहीं है कि हम पिछली परिस्थितियों से अभी भी प्रभावित हो रहे हैं या नहीं , ऐसा होना सामान्य है और सबके साथ होता है ; बल्कि जरूरी ये है कि अगर हम अपनी समझ पर इतना मनचाहा नियंत्रण रख पाएं कि हम उन पुराने अनुभवों से भी परे जाकर सोच सकें , निर्णय ले सकें और विकल्पों को चुन सकें तो हम तटस्थ होना सीख सकते हैं ( दूसरे पहलू से ये एक तरह से अपने भीतर कहीं समय को नियंत्रित करने जैसा है ) . घटनाओं का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष उन्हें तटस्थ नजरिये से देख पाना ही है . हम ऐसा नजरिया विकसित कर सकते हैं जो वास्तव में किसी भी पूर्वाग्रह से ग्रस्त न हो और चीजों को सामान्य परंपरा से हटकर देख सके .
Monday, April 5, 2010
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