बचपन में मैं सोचा करता था कि सारे लोग एक जैसे क्यों नहीं होते जबकि हमारे आदर्श नियम एक जैसे हैं और हर आदमी को उन्हें निभाना चाहिए .अगर ऐसा हो सके तो फिर काफी समस्याएं ऐसे ही सुलझा ली जानी चाहिए, मगर शायद वो चीजों को देखने का सबसे आसान तरीका था . अब मैं सोचता हूँ कि जो बातें किताबों पर कुछ और दिखती हैं उनकी संरचना का वास्तविक अनुमान काफी धुंधला और कठिन होता है, क्योंकि आप किताबी बातों को कोरा का कोरा प्रत्यक्षतः खड़ा नहीं कर सकते. जब वे सामने आती हैं तो उनमें पता नहीं क्या-क्या मिला होता है और जब तक आप उन बातों का अध्ययन करते हैं तब तक कोई न कोई अवयवी बात खुद में अलग हो जाती है . ये सब कुछ ऐसा है कि आप किसी न जानी हुयी चीज के बारे में सोच रहे हैं कि ये इस तरह बदलेगी पर आप उस चीज को अभी तक जान नहीं पाए हैं. कम से कम नियमों के बारे में ये बात लागू होती ही है. आप लोगों से ध्यान से बातें करिए और आप पाएंगे कि काफी लोग नियमों को अपनी सहूलियत के हिसाब से मोड़ देते हैं या उनकी बात तभी करते हैं जब वो उन्हें आराम से निभा सकते हैं .
क्या सभी को कठोरता से उनका पालन करना चाहिए ? ऐसा मैं नहीं कहना चाहता , बल्कि मैं लोगों का ध्यान ठीक इस ओर खींचना चाहता हूँ कि सोचिये अगर सारे लोग एक जैसी सोच रखें, एक जैसी बातें करें, एक जैसा पहनें या देखना चाहें या एक जैसी पसंद रखें तो सब कुछ कितना मशीनी लगेगा और कितना एक जैसा हो जायेगा जैसा कि आदर्श और कठोर नियम हमसे चाहते हैं. हमारे अपनी -अपनी तरह से चीजों को देखने का ढंग ही हमारे अस्तित्व की पुष्टि करता है. यही इस दुनिया के लगातार कुछ नए में सुधरते रहने का आधार है और यही हमारी विविधता को भी सहारा देता है .
नियमों का होना अराजकता को रोकता है मगर उनका पालन सभी करें ऐसा कभी भी संभव नहीं हो सकता है क्योंकि दुनिया हमेशा से ही तमाम संभावनाओं और विकल्पों से भरी हुयी है और रहेगी. "नियमों से संभावनाओं और संभावनाओं से नए नियम " ये चक्र ही हमें नियंत्रित करता आ रहा है .
Saturday, March 27, 2010
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